इस्लामाबाद/वॉशिंगटन: पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान सोमवार को तीन दिन की अमेरिका यात्रा पर जा रहे हैं। प्रधानमंत्री के तौर पर यह उनका पहला अमेरिका दौरा है। उनके साथ एक प्रतिनिधिमंडल भी जा रहा है। इसमें सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा और आईएसआई चीफ फैज हमीद भी शामिल हैं। संभवत: यह पहला मौका होगा जब प्रधानमंत्री के साथ दो सबसे बड़े सैन्य अधिकारी भी किसी अमेरिकी राष्ट्रपति से मुलाकात के दौरान मौजूद रहेंगे।

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि अमेरिकी प्रशासन ने इसकी मंजूरी इसलिए दी है ताकि सरकार और सेना से एक साथ ठोस बातचीत की जा सके और इसके बेहतर नतीजे मिलें। इस बीच, 10 अमेरिकी सांसदों ने ट्रम्प को पत्र लिखकर कहा है कि उन्हें इमरान से मुलाकात के दौरान सिंध में मानव अधिकार उल्लंघन का मसला भी उठाना चाहिए।

विदेश मंत्री ने पुष्टि की
पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि इमरान और डोनाल्ड ट्रम्प की मुलाकात के दौरान जनरल बाजवा भी मौजूद रहेंगे। पाकिस्तान के अखबार ‘द डॉन’ के मुताबिक, इस मुलाकात में बेहद अहम मसलों पर चर्चा होनी है। अफगानिस्तान में सक्रिय तालिबान और हक्कानी नेटवर्क पर अमेरिका निर्णायक कार्रवाई करना चाहता है। इन संगठनों को आईएसआई और पाकिस्तान सेना पनाह देती है। अमेरिका बाजवा और हमीद को साथ बिठाकर उनसे ठोस आश्वासन चाहेगा ताकि भविष्य में सरकार और सेना दोनों को जवाबदेह ठहराया जा सके।

तीन घंटे व्हाइट हाउस में रहेंगे इमरान
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इमरान और पाकिस्तान का प्रतिनिधिमंडल करीब 3 घंटे व्हाइट हाउस में रहेगा। हालांकि, अभी ये साफ नहीं है कि ट्रम्प और इमरान की मुलाकात कितनी देर चलेगी। इसी दौरान प्रतिनिधिमंडल स्तर की बातचीत भी होगी। जनरल बाजवा पेंटागन भी जाएंगे। इस दौरान वो रक्षा मंत्री पैट्रिक एम. शनहान, ज्वॉइंट चीफ ऑफ स्टाफ जनरल मार्क मिले और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से भी मुलाकात करेंगे।

सेना की अहम भूमिका
दक्षिण एशियाई मामलों के अमेरिकी जानकार मार्विन वेनबाम ने वाशिंगटन में सैन्य अधिकारियों को लाने के फैसले पर कहा, वॉशिंगटन में नीति निर्माताओं ने देखा है कि लंबे समय के बाद, पाकिस्तान के नागरिक और सैन्य नेता महत्वपूर्ण मुद्दों पर एक साथ हैं। वेनबाम ने कहा कि अफगानिस्तान और आतंकवाद दक्षिण एशिया में ट्रम्प प्रशासन की दो प्राथमिक चिंताएं हैं और वे जानते है कि ऐसे मुद्दों पर सेना के समर्थन के बिना पाकिस्तान में कोई बड़ा निर्णय लागू नहीं किया जा सकता है।