धर्म डेस्क. सोमवार, 5 अगस्त को सावन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि है, इस दिन नाग पंचमी मनाई जाती है और भक्त नाग देवता की पूजा करते हैं। हिन्दू धर्म में नागों का पौराणिक महत्व बताया है। नाग पंचमी के अवसर पर जम्मू कश्मीर के संस्कृत विद्वान महंत रोहित शास्त्री और महर्षि पाणिनी संस्कृत एवं वैदिक विश्व विद्यालय के असिसटेंट प्रोफेसर डॉ. उपेंद्र भार्गव की रिसर्च के अनुसार जानिए नागों से जुड़ी

पौराणिक मान्यताएं और खास बातें…
प्राचीन काल से ही पूजा जा रहा नाग देवता को
श्रीमद्भागवत गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि सर्पाणामस्मिवासुकि यानी सर्पों में मैं वासुकि हूं यानी नागों में वासुकि सर्वश्रेष्ठ है। भारतीय वाङ्मय पुराण में 33 कोटि यानी 33 प्रकार के देवी-देवताओं के बारे में बताया गया है। इनमें देवी, देवता, नाग, यक्ष, गंधर्व शामिल हैं। इनके अतिरिक्त क्षेत्राधिष्ठित देवताओं का भी महत्व है। क्षेत्राधिष्ठित यानी लोकपाल या क्षेत्रपाल यानी ग्राम देवता, कुल देवता और स्थान देवता की पूजा का भी विधान है। इनमें नाग देवता की पूजा सर्वाधिक की जाती है, क्योंकि कई क्षेत्रों में नाग देवता को ही ग्राम देवता, कुल देवता और स्थान देवता माना जाता है। दक्षिण भारत में और उत्तर भारत में नाग देवता के कई प्राचीन मंदिर हैं। कर्नाटक के मंगलौर में कुकी सुब्रह्मण्यम् मंदिर काफी प्रसिद्ध है। भारत के कई शहरों का नाम नागों के आधार पर ही रखे गए हैं जैसे नागपुर, उरगापुर, नागारखंड, नागवनी, अनंतनाग, शेषनाग, नागालैंड, भागसूनाग आदि शहरों के नाम नाग से प्रभावित हैं। इसका अर्थ यही है कि इन क्षेत्रों में नाग देवता को सर्वोपरि माना गया है। उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में नागालैंड को नागवंशियों का मुख्य स्थान माना गया है।

महाभारत में नाग कन्या उलुपी
महाभारत में पांडव अर्जुन का विवाह नाग कन्या उलुपी से हुआ था। विवाह के समय अर्जुन उत्तर-पूर्व की यात्रा कर रहे थे। तभी से ये क्षेत्र यानी नागालैंड नाग वंशियों का प्रमुख स्थान है। यहां का मणिपुर शहर नाग मणि की ओर संकेत करता है।

नागों के प्रकार
पुराणों में अष्टकुली नाग बताए गए हैं। ये हैं शेष, वासुकि, कंबल, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंख, कुलिक नाम के नाग प्रमुख है। कुछ जगहों पर इन नामों को लेकर मतभेद भी हैं। कहीं-कहीं तक्षक, महापद्म, शंख, कुलिक, कंबल, अश्वतर, धृतराष्ट्र, वालाहक नाम के नाग बताए गए हैं।

नागों की उत्पत्ति
वराहपुराण के 24वें अध्याय के अनुसार प्राचीन समय में कश्यप नाम के एक ऋषि थे। उनका विवाह दक्ष पुत्री कद्रु से हुआ था। विवाह के बाद कश्यप और कद्रु के नाग पुत्रों का जन्म हुआ। उनके नाम है अनंत, वासुकि, महाबलवान्, कंबल, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंख, कुलिक और अपराजित। ये सभी नाग कुटिल थे। इंसानों को देखते ही डंस लेते थे। जब इन नागों का आतंक बढ़ गया तो सभी मनुष्यों ने ब्रह्माजी से प्रार्थना की कि इन विशाल और विषैले नागों से हमारी रक्षा करें। भगवान ब्रह्माजी ने कहा कि मैं आप सभी की रक्षा करूंगा, इसमें संदेह न करें।

इसके बाद ब्रह्माजी ने वासुकि आदि नागों को बुलाया और शाप दिया कि जिस प्रकार तुम सभी मेरे द्वारा उत्पन्न किए गए मनुष्यों का संहार कर रहे हो, ठीक उसी प्रकार अगले जन्म में तुम सभी का नाश हो जाएगा। इस शाप से डरकर सभी नागों से ब्रह्माजी से दया करने की प्रार्थना की। नागों ने कहा कि भगवान आपने ही हमारी भी रचना की है, हमें विष दिया है और कुटिल बुद्धि है। आप ही हमें शांत करें।

नागों ने ब्रह्माजी से कहा कि आप ही हमारी और मनुष्यों की अलग-अलग मर्यादाओं का निर्धारण करें। आप ही हमारे और मनुष्यों के रहने के लिए अलग-अलग स्थान और समय तय करें।

तब ब्रह्माजी ने सभी नागों से कहा मैं तुम सभी को रहने के लिए पाताल, वितल देता हूं। अब से तुम सभी भूमि के अंदर ही रहोगे। इसके बाद जो दुष्ट और क्रूर नाग होंगे, उनका नाश हो जाएगा। जो मनुष्य तुम्हें सताए या मारने की कोशिश करे, तुम उन्हें डंस सकते हो।

ब्रह्माजी ने सभी मनुष्यों से कहा कि आप अब से मंत्र और औषधियों से नागों के विष का असर दूर कर सकेंगे। अब से निर्भय होकर रहो। जो नाग अकारण मनुष्यों को सताएगा और जो मनुष्य नागों को सताएगा, उन सभी का नाश हो जाएगा। इसके बाद सभी नाग पृथ्वीतल में चले गए और वहीं रहने लगे।

जब ब्रह्माजी ने नागों के रहने के लिए अलग व्यवस्था बनाई, उस दिन सावन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि थी। इस तिथि पर जो भी मनुष्य नागों की पूजा करता है, वे उसके मित्र बन जाते हैं। तभी से नागों की पूजा करने की परंपरा चली आ रही है।

वेदों में नागों का उल्लेख
अथर्ववेद में सर्पविषनाशन सूक्त वैदिककाल के सर्पों के बारे में बताता है। इस वेद में 18 प्रकार के नाग बताए गए हैं। गुण, प्रकृति के आधार 18 इस प्रकार है-
कैरात यानी वे नाग जो भीलों के क्षेत्र में रहते हैं। पृश्नि यानी वे नाग जो विशेष चिह्न वाले हैं। उपतृथ यानी वे सर्प जो घास में रहते हैं। बभ्रु यानी वे नाग जो धूम्रवर्ण हैं। असित यानी काल सांप। अलीक यानी अमंगल सर्प। तेमात यानी जल में रहने वाला नाग। अपोदक शुष्क प्रदेश में रहने वाला सांप। सात्रासाह यानी विनाशक सर्प। मन्यु यानी क्रोध में रहने वाला सांप। आलिगी यानी शरीर से लिपटने वाली नागिन। विलगी यानी शरीर से दूर भागने वाली नागिन। उरुगुला यानी ऊंचे-नीचे स्थान पर रहने वाली नागिन। असिक्नी यानी काली नागिन। दद्रुषि यानी वह नागिन जिसके डंसने पर मनुष्य को फोड़े-फूंसी हो जाते हैं। कर्णा यानी कानों वाली नागिन। श्वावित् यानी वह नागिन जिसे कुत्ता काट लेता है। खनित्रिमा यानी गड्ढे में रहने वाली नागिन।

आमतौर पर असित, तैमात, अपोदक, अलिगी, असिक्नी और खनित्रिमा नाम के नाग दिखाई देते हैं।

पुराणों में नाग
पुराणों में नागों से जुड़ी कई कथाएं हैं। भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर विश्राम करते हैं। श्रीकृष्ण ने कालिया नाग का दमन किया था। भगवान शिव नाग को आभूषण की तरह धारण करते हैं। नागों का संबंध देवी-देवताओं से होने से इन्हें पूजनीय माना गया है।

डॉ. अनंतराम शास्त्री वासुकिपुराण के समीक्षक लिखते हैं कि भारत के हर क्षेत्र में नाग पूजा धर्म का अभिन्न अंग है। कुछ क्षेत्रों में नागों को पूर्वजों की आत्मा के रूप में देखा जाता है तो कहीं-कहीं पर नागों को खजानों का रक्षक माना जाता है।
जैन धर्म में भी नाग पूजा का महत्व है। जैन धर्म के भगवान पार्श्वनाथ का विग्रह नाग चिह्नित है।

लीलावती ग्रंथ में लिखा है कि –
लीलागललुलल्लोल कालव्यालविलासिने। गणेशाय नमो नील कमलामलकांतये।। (लीलावती)
इस श्लोक में विकराल कालव्याल नागों से लीला करते हैं, ऐसे भगवान गणेश की स्तुति की गई है।
दुर्गासप्तशती में लिखा है कि –
अक्षस्त्रक्परशुं गदेषु कुलिशं पद्मं धनुष्कुंडिकाम्।
इस श्लोक में पद्म शब्द आया है। ये अष्ट नागों में से एक पद्म नाग से संबंधित है। इस श्लोक के अनुसार देवी दुर्गा ने भी नाग को धारण किया है।
भगवान सूर्य से संबंधित स्तुति में लिखा है कि –
केयुरवान मकर कुंडलवान किरीटी, हारी हिरण्मयवपुर्धृत शंखचक्र:।
इस श्लोक में शंखचक्र शब्द आया है। ये भी अष्टनागों में से एक नाग का नाम है। इस श्लोक के अनुसार भगवान सूर्य ने भी नाग को धारण किया है।
श्रीकृष्ण के बड़े भाई हैं शेषनाग
विष्णुधर्मोत्तर पुराण, हरिवंशपुराण, भागवत पुराण के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम शेषनाग के अवतार माने गए हैं। जब द्वारिका में बलराम ने प्राण त्यागे तो उनके मुख से श्वेत नाग निकला और वह समुद्र में प्रवेश कर गया था।
वासुकि को माना जाता है सर्वश्रेष्ठ नाग
महाभारत के आदिपर्व में जनमेजय सर्पसत्र में वासुकि, तक्षक, ऐरावत, कौरव्य और धृतराष्ट्र वंश के नागों को जनमेजय का कोप सहना पड़ा था। उस समय वासुकि नाग की बहन और जरत्कारु नाम के नाग के संयोग से आस्तीक नाम के ऋषि उत्पन्न हुए थे। आस्तीक ऋषि ने ही समस्त नागों को जनमेजय के क्रोध से बचाया था। जन्मू कश्मीर में चंद्रभागा नदी के पास भद्रवाह नाम के स्थान पर वासुकि नाग का मंदिर है।
बाली द्वीप पर वासुकि नाग को समुद्र का देवता माना जाता है। श्रीमद्भागवत गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि सर्पाणामस्मिवासुकि यानी सर्पों में मैं वासुकि हूं। समुद्र मंथन के समय वासुकि नाग को ही रस्सी की तरह देवताओं और दानवों ने उपयोग किया था।
निष्कर्ष
इन सभी तथ्यों का निष्कर्ष यही है कि हिन्दू धर्म में नागों को प्राचीन काल से पूजनीय माना गया है। सभी सांप भी हमारे समाज का अभिन्न अंग है। इसीलिए इंसानों को नागों की रक्षा करनी चाहिए और इन्हें अकारण सताना नहीं चाहिए।