अम्बाला. इमरजेंसी के बाद 1977 में चुनाव की घोषणा हुई। कांग्रेस के खिलाफ सारे दल जनता पार्टी के बैनर तले मैदान में थे। अम्बाला कैंट में कांग्रेस या जनसंघ के बीच ही मुकाबला होता रहा था। लेकिन यहां की टिकट जॉर्ज फर्नांडीस की सोशलिस्ट पार्टी के खाते में आई। फर्नांडीस के ऊपर इंदिरा सरकार ने कुछ केस कर रखे थे, जिनमें एडवोकेट सुषमा स्वराज और उनके पति स्वराज कौशल पैरवी कर रहे थे।

टिकट मिलने के बाद सुषमा जब पहली बार जनसंघ (बाद में भारतीय जनता पार्टी बना) के दफ्तर गईं तो उनका जबर्दस्त विरोध हुआ। विरोध के बीच किसी ने सुषमा को धक्का मार दिया और वे जमीन पर गिर पड़ीं। एक बार तो सुषमा हताश हुईं। इसी दौरान जनसंघ के टिकट पर 1968 में कैंट से विधायक रहे लाला भगवान दास ने बहनजी से मेरी मुलाकात कराई। कुछ माह पहले ही मैंने (डॉ. जयदेव) लोकसभा की अम्बाला सीट पर जनसंघ प्रत्याशी सूरजभान का चुनाव अभियान संभाला था। शहर के लोगों से चंदे में जुटाए 16 हजार रुपए में सूरजभान का पूरा चुनाव हुआ और वे जीते। मैं किसी पार्टी से नहीं जुड़ा था और उससे पहले सुषमा को जानता तक नहीं था। सुषमा ने मुझे अपने प्रचार की कमान संभालने को कहा। सुषमा के पहले चुनाव पर 13 हजार रुपए ही खर्च हुए।

वे 4 बार के विधायक देवराज आनंद को हराकर जीतीं। जीत के नशे में सुषमा को समर्थक शहर में जुलूस निकालने और आनंद के घर के बाहर चिढ़ाने के लिए ढोल बजवाने की तैयारी करने लगे। मुझे पता चला तो मैंने बहनजी से कहा-ये ठीक नहीं होगा। उन्होंने समर्थकों को मना कर दिया। फिर हमने अनाज मंडी में सभा की, जिसमें करीब 13-14 हजार लोग पहुंचे थे। मेरे मनाने पर देवराज आनंद भी सभा में आए और सुषमा के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। मैंने मंच से सुषमा जी को खड़ी होकर कुछ संकल्प लेने की बात कही तो वह चौंक गई। हालांकि खड़ी हो गईं और जो संकल्प मैं बोलता रहा वह दोहराती रहीं। इसमें शहर की समस्याओं से जुड़े मुद्दे थे।

सुषमा चंडीगढ़ रहतीं थी, लेकिन शनिवार-रविवार को अम्बाला आतीं। उनका एक कार्यक्रम तय था कि शहर की सारी स्लम बस्तियों में जातीं थी और जमीन पर दरी बिछाकर समस्याएं सुनतीं। अफसर भी नीचे बैठते थे। बस्तियों की महिलाओं से गले मिलतीं, उनके घर से आई चाय पीतीं। अम्बाला के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा था। वह महिलाओं और गरीबों में खूब लोकप्रिय हो गईं। महिलाएं यही कहती थीं- शनिवार को बाला (सुषमा के घर का नाम) आएंगी, तो मैं चाय पिलाऊंगी।

1980 में टांगरी की वजह से कैंट में बाढ़ आ गई। पूरे शहर में गले तक पानी था। सुषमा तब दिल्ली में थीं। मैंने फोन किया तो उन्होंने तुरंत सीएम देवीलाल और कैबिनेट को सूचना दी। अगले दिन सुबह ही सीएम पहुंच गए थे। देवीलाल को सुषमा की कार्यशैली पसंद थी। हालांकि फरीदाबाद में मिल प्रबंधन और लेबर विवाद में सुषमा ने सीएम के खिलाफ बयान दे दिया। सीएम ने भी जवाबी बयान दे दिया। इससे सुषमा इतनी आहत हुईं कि मंत्री पद छोड़ दिया। सुषमा की इच्छा थी कि किसी तरह केंद्र में चली जाएं, ताकि दिल्ली में रहने का मौका मिले क्योंकि उनके पति दिल्ली में वकालत कर रहे थे। इसी वजह से उन्होंने करनाल से लोकसभा चुनाव लड़ा पर जीत नहीं मिली। 1987 में दोबारा अम्बाला कैंट से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत गईं। देवीलाल सरकार में शिक्षामंत्री बनीं। दिल्ली जाने की चाह इतनी थी कि 1990 में राज्यसभा चलीं गईं। तब 10 महीने के लिए उपचुनाव होना था।

अपनी राजनीतिक विरासत देने के लिए सुषमा ने मुझे अपनी पहली पसंद बताया, लेकिन मैंने चुनाव लड़ने से मना कर दिया था। उपचुनाव में अनिल विज भाजपा के टिकट पर विधायक बने थे। 1977 में मंडी के मंच से सुषमा ने कैंट के लिए जो संकल्प लिए थे वो तब पूरे हुए जब बतौर राज्यसभा सांसद उन्हें 1 करोड़ सलाना की ग्रांट मिली। तब यहां 10 कम्युनिटी सेंटर, 20 आंगनबाड़ी, गुड़गुड़िया नाला और सिविल अस्पताल में कमरे बनवाए थे। हालांकि बाद में बंसीलाल के बेटे सुरेंद्र सिंह ने कहा राज्यसभा सांसद का यह पैसा बाकी हरियाणा को भी मिलना चाहिए, तब अम्बाला में काम बंद हुए।