धर्म डेस्क. 2019 का सावन माह 15 अगस्त को समाप्त हो जाएगा। इस माह में शिवजी की पूजा और उनके मंदिरों में दर्शन करने की परंपरा है। शिवजी के भक्त इस माह में अपने सामर्थ्य और समय के अनुसार ज्योतिर्लिंगों के दर्शन भी करते हैं। बारह ज्योतिर्लिंगों में भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग का छठा स्थान है। ये ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के पुणे से करीब 110 किमी दूर सहाद्रि नामक पर्वत पर है। मान्यता है कि इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना कुंभकर्ण के पुत्र भीम की वजह से हुई है।
ये हैं ज्योतिर्लिंग की कथा

मंदिर में प्रचलित कथा के अनुसार त्रेता युग में रावण का भाई कुंभकर्ण कर्कटी नाम की एक महिला पर मोहित हो गया और उससे विवाह कर लिया। विवाह के बाद कुंभकर्ण लंका लौट आया, लेकिन कर्कटी अपने क्षेत्र में ही रुक गई थी।
कुछ समय बाद कर्कटी ने एक पुत्र को जन्म दिया। इसका नाम भीम रखा गया। जब श्रीराम ने कुंभकर्ण का वध कर दिया तो कर्कटी ने अपने पुत्र को देवताओं के छल से दूर रखने का निर्णय किया और वहां से दूर चली गई।
जब भीम बड़ा हुआ तो उसे अपने पिता कुंभकर्ण की मृत्यु का कारण पता चला। तब उसने देवताओं से बदला लेने का निश्चय कर लिया। भीम ने ब्रह्माजी की तपस्या की और उनसे बहुत ताकतवर होने का वरदान प्राप्त कर लिया।
उस समय कामरूपेश्वप नाम के एक राजा शिवजी के भक्त थे। एक दिन भीम ने राजा को शिवलिंग की पूजा करते हुए देखा। भीम ने राजा से कहा कि शिव को छोड़कर मेरी पूजा करो। राजा के ये बात नहीं मानी तो भीम ने उन्हें बंदी बना लिया।
राजा कारागार में ही शिवलिंग बना कर उसकी पूजा करने लगा। जब भीम ने ये देखा तो उसने अपनी तलवार से राजा के बनाए शिवलिंग को तोड़ने का प्रयास किया, तभी वहां शिवजी प्रकट हुए और उन्होंने भीम का संहार कर दिया।
वहां सभी देवता प्रकट हुए और उन्होंने शिवजी से वहीं वास करने का निवेदन किया। शिवजी ने सभी की प्रार्थना स्वीकार की और ज्योति स्वरूप में वहां स्थापित हो गए। इस स्थान पर भीम से युद्ध करने की वजह से इस ज्योतिर्लिंग का नाम भीमाशंकर पड़ गया।
मंदिर की खास बातें
भीमशंकर मंदिर के शिखर का निर्माण कई प्रकार के पत्थरों से किया गया है। यह मंदिर नागर शैली में बना हुआ है। मंदिर में कहीं-कहीं इंडो-आर्यन शैली भी देखी जा सकती है। यहां माता पार्वती का मंदिर भी है। जिसे कमलजा मंदिर कहा जाता है। मान्यता है कि इसी स्थान पर देवी ने राक्षस त्रिपुरासुर से युद्ध किया था। युद्ध के बाद ब्रह्माजी ने देवी पार्वती की कमल के फूलों से पूजा की थी। मंदिर के पास ही कई कुंड भी हैं। यहां मोक्ष कुंड, सर्वतीर्थ कुंड, ज्ञान कुंड, और कुषारण्य कुंड नाम के कुंड हैं।

कैसे पहुंच सकते हैं भीमाशंकर
शिवजी के इस ज्योतिर्लिंग तक पहुंचने के लिए आपको पहले पूणे या नासिक पहुंचना होगा। पूणे या नासिक के बाद सड़क मार्ग से मंदिर तक पहुंच सकते हैं।