धर्म डेस्क. हिंदू पंचांग की एकादशी तिथि चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो या शुक्ल पक्ष की, हिंदू धर्म में उसका महत्व बहुत अधिक होता है। प्रत्येक माह की कृष्ण और शुक्ल एकादशियां अपने आप में खास होती हैं। एकादशी के दिन भगवान विष्णु की आराधना की जाती है और उपवास भी रखा जाता है। श्रावण और पौष मास की एकादशियों का महत्व एक समान माना जाता है। इन एकादशियों को संतान प्राप्ति के लिए श्रेष्ठ माना गया है। श्रावण मास की एकादशी को श्रावण पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। जानते हैं श्रावण शुक्ल एकादशी की व्रत कथा व पूजा विधि के बारे में। यह इस बार 11 अगस्त को है।

श्रावण पुत्रदा एकादशी 11 अगस्त
एकादशी तिथि आरंभ सुबह 10:09 (10 अगस्त)
एकादशी तिथि समाप्त सुबह 10:52 (11 अगस्त)
द्वादशी तिथि समाप्त दोपहर 12:07 (12 अगस्त)

श्रावण शुक्ल एकादशी व्रत विधि
एकादशी व्रत के लिए दशमी के दिन व्रती को सात्विक आहार लेना चाहिए। ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि से स्वच्छ होकर व्रत का संकल्प लें और भगवान विष्णु के बाल गोपाल रूप की पूजा करें। रात्रि में भजन कीर्तन करते हुए जागरण करना चाहिए। तत्पश्चात द्वादशी के दिन के सूर्योदय के साथ पूजा संपन्न की जानी चाहिए। इसके पश्चात व्रत का पारण किसी भूखे जरूरतमंद या फिर पात्र ब्राह्मण को भोजन करवाकर करना चाहिए।

इस व्रत की कथा
युद्धिष्ठिर भगवान श्री कृष्ण से श्रावण एकादशी के महत्व को बताने का आग्रह किया। तब श्री कृष्ण ने उन्हें बताया कि द्वापर युग में महिष्मतीपुरी का राजा महीजित बड़ा ही शांति एवं धर्म प्रिय था। लेकिन वह पुत्र-विहीन था। जब महामुनि लोमेश के निर्देशानुसार प्रजा के साथ-साथ जब राजा ने भी यह व्रत रखा, तो कुछ समय बाद रानी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। तभी से इस एकादशी को श्रावण पुत्रदा एकादशी कहा जाने लगा।